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11. निरीक्षण महानिदेशकसंगठन आरंभ में एकल रूप से गठित अनुसंधान एवं विकास और निरीक्षण संगठन का हिस्सा था और दो कार्यों अर्थात् अनुसंधान एवं विकास और निरीक्षण के लिए विभक्त करने की प्रक्रिया युद्ध सामग्री खंड के विभाजन के साथ 1958 में आरंभ हो गई थी। यह प्रक्रिया 1968 में इंजीनियरिंग खंड के विभाजन के साथ समाप्त हुई।

12. 1963 में, सामग्री उत्पादन निदेशालय (नौसेना) को निरीक्षण महानिदेशालय में स्थानांतरित कर दिया गया और उसे विकासऔर निरीक्षणनिदेशालय (मेरीन सामग्री), डी.डी.आई. (एम.एस.) कहा जाने लगा।  1968 में, डी.डी.आई. (एम.एस.)  को विकास और निरीक्षण निदेशालय (मेरीन सामग्री) में बदला गया और उत्पादन औरनिरीक्षणनिदेशालय  (नेवल)- DPIN का नाम दिया गया। मूलतः इसे नव निर्मित जहाजों की आवश्यकता संबंधी देखरेख के लिए गठित किया गया था, जिनमें एमडीएल, बॉम्बे में लिएंडर क्लास फ्रिजेस मुख्य था, जबकि उत्पादन और निरीक्षण निदेशालय समस्त नौसेना सामग्री सहित उनके कलपुर्जों से संबंधित कार्य देखता था।

13. 1965 में, वाहन निरीक्षण निदेशालय को वाहन निरीक्षणनिदेशालयऔरवाहननिदेशालय (अनुसंधान एवं विकास)में विभाजित किया गया था।

14. 1968 में, इंजीनियरिंग अनुसंधान एवं विकास निदेशालय को भी उत्पादन निदेशालय औरइंजीनियरिंगउपकरणनिरीक्षण (DPIE) और इंजीनियरिंगअनुसंधान एवं विकास निदेशालयमें विभाजित किया गया था।

उसी वर्ष अनुसंधान एवं विकास निदेशालय (सामान्य) निरीक्षणनिदेशालय (सामान्य सामग्री) और अनुसंधान एवं विकासनिदेशालय (सामान्य सामग्री) में विभाजित किया गया था।
बाद में 1975 में, डी.पी.डब्ल्यू. को पूर्ण उपकरणों सहित समस्त मेरीन इंजीनियरिंग और कलपुर्जों सहित रोटेटिंग इलेक्ट्रिकल मशीनरी (वेंटिलेशन फैंस को छोड़कर) का जिम्मा भी सौंपा गया, जबकि उत्पादन और निरीक्षण निदेशालय को इलेक्ट्रिकल, इलैक्ट्रॉनिक्स, हथियारों और वेंटिलेशन फैंस सहित अन्य संरक्षी नौसेना सामग्री मदों की जिम्मेदारी सौंपी गई।

 

 

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